आज़ादी के हुतात्माओं के जीवित, परन्तु समाज से उपेक्षित वंशजों को नया जीवन दे रहे हैं शिवनाथ !

 

देश की आज़ादी के लिए असंख्य लोगों ने प्राणों की आहुति दी लेकिन आज़ादी के 72 वर्ष बाद स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के क्या हालात हैं, यह किसी ने जानने की कोशिश नहीं की। अगर आपको पता चले कि उधम सिंह के पोते कंस्ट्रकशन कंपनी में मजदूर हैं और बोझा ढोते हैं,. तात्या टोपे के वंशज एक छोटी सी किराने के दूकान चलाते हैं और बेरोज़गार घूम रहे हैं तो आपको कैसा लगेगा ?

किसी भी स्वतंत्रता सेनानी के जन्म दिवस या पुण्य तिथि पर कार्यक्रमों का आयोजन होता है। सोशल मीडिया पर पोस्ट्स की बाढ़ आ जाती हैं लेकिन उनके परिवार जनों की खोज खबर करने वाला कोई नहीं है। इसी समस्या के समाधान के लिए एक पत्रकार ने मुहिम चलायी हैं जो न केवल स्वतंत्रता सेनानियों के गुमनाम परिवारों को पहचान दिलाते हैं बल्कि आर्थिक सहायता करके सम्मानपूर्ण जीवन यापन सुनिश्चित करते हैं। अपने आंदोलन के जरिये स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारजनों को गरिमामयी जीवन दिलाने की कोशिश कर रहे हैं शिवनाथ झा (Shivnath Jha)।

इंडियनमार्टियर्स (डॉट)इन नाम की संस्था के माध्यम से शिवनाथ झा अब तक गुमनाम क्रान्तिकारियों और शहीदों के लगभग 70 से अधिक वंशजों को ढूंढ चुके हैं। 6 पुस्तकों के माध्यम से 6 शहीद क्रांतिकारियों के वंशजों के परिवारों को गुमनामी के जीवन से निकाल कर प्रकाश में लाये हैं। इन परिवारों में तात्या टोपे, बहादुर शाह ज़फर, उधम सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्र शेखर आज़ाद के वंशज प्रमुख हैं।

शिवनाथ झा (Shivnath Jha) पेशे से पत्रकार हैं और देश के नामी मीडिया हाउस में काम कर चुके हैं। शिवनाथ झा ने अपने जीवन की शुरुआत 1968 में आठ साल की उम्र में एक अखबार बेचने वाले के रूप में की। उनके पिता एक पब्लिशिंग फर्म में काम करते थे और 45 रुपये मासिक तनख्वाह मिलती थी। अपना स्वयं का खर्च एवं पढाई की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने खेलने-कूदने की उम्र से ही उन्होंने अखबार बेचना शुरू कर दिया।

बी पॉजिटिव इंडिया से बात करते शिवनाथ कहते हैं: “अगर बीमारी नहीं हो तो पेट में होने वाली दर्द मुख्यतः दो कारणों है। एक – अगर पेट में अन्न का एक भी दाना नहीं हो, अमाशय भोजन के लिए सिकुड़ने लगे, सूखने लगे और दूसरा – इतना अधिक खाना खा लें की सांस लेने में भी दिक्कत हो। हम प्रथम श्रेणी के दर्द को मुद्दत तक अनुभव किये हैं, इसलिए यह महसूस कर सकते हैं कि एक भूखा, समाज से उपेक्षित व्यक्ति का जीवन कैसा होता है।

भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के गुमनाम क्रान्तिकारियों, शहीदों के वंशजों का औसतन हाल यही है और प्रयास की बुनियाद भी इसी दर्द पर आधारित है। हम चाहते हैं कि अपने प्रयास से, विभिन्न किताबों से अपने जीवन में कम से कम 20-25 वंशजों के घरों में प्रकाश लाऊँ।“

18 मार्च 1975 को जब सारा देश क्रांति के महानायक जय प्रकाश नारायण ( Jai Prakash Narayan) की क्रांति का जश्न मना रहा था उस दिन पटना से प्रकाशित होने वाले अखबार “आर्यावर्त-इण्डियन नेशन” में सिर्फ साढ़े चौदह साल के शिवनाथ ने पत्रकारिता की सबसे नीचली सीढ़ी ‘कॉपी-होल्डर’ (प्रूफ रीडर के साथ मुख्य टेक्स्ट को पढ़ने वाला) के रूप में काम करना शुरू किया और उस के बाद से कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

1975 से लेकर 2019 तक शिवनाथ ने भारत के लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्रों, संपादकों के साथ संवादाता के रूप में कार्य किया। देश के साथ ही ऑस्ट्रेलिया के स्पेशल ब्रॉडकास्टिंग सर्विस के हिंदी प्रसारण सेवा में भी देश का प्रतिनिधित्व किया। दी टेलीग्राफ, दी इन्डियन एक्सप्रेस, दी स्टेट्समैन, सहारा टाईम, एसियन ऐज जैसे संस्थानों में काम किया।

शिवनाथ (Shivnath Jha) ने अपनी पत्रकारिता की सम्पूर्ण सीख को एक ऐसी दिशा की ओर मोड़ दिया है जिसकी तरफ आज़ादी के बाद सत्तर सालों से किसी ने भी देखा नहीं या यूँ कहें की देखने की कोशिश तक न की। परन्तु भारतीय राजनीति में जब भी अपने फायदे की बात आती है, तो उन्ही लोगों की याद सबको आती है। हम बात कर रहे हैं क्रांतिकारियों की, जिनमे से महज गिने-चुने हुए नामों को छोड़ कर बाकी सारे नामों को भुला दिया गया।

शहीदों और क्रांतिकारियों के परिवारों को ढूंढने के विचार के बारे में पूछने पर वो बताते है कि इस प्रयास की शुरुआत वर्ष 2005 से हुई जब भारत रत्न शहनाई सम्राट बिस्मिल्लाह खान को अपने जीवन के अंतिम बसन्त में अपने लिए मदद की गुहार लगानी पड़ी थी। शिवनाथ और उनकी पत्नी नीना झा (जो कि पेशे से शिक्षिका हैं) इसके लिए आगे आये और एक किताब “मोनोग्राफ ऑन उस्ताद बिस्मिल्लाह खान” लिखी.

इस किताब का विमोचन स्वयं खान साहब ने वर्ष 2006 में अपने जन्मदिवस पर किया था। इसी वर्ष 21 अगस्त को उस्ताद अल्लाह के पास चले गए। आपको बता दे कि उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने दिल्ली के लाल किले पर स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर अपनी शहनाई से स्वतंत्र भारत का स्वागत किया था।

शिवनाथ झा (Shivnath Jha) शहीदों के परिवारों की मदद के लिए विभिन्न विषयों पर पुस्तक लिखते हैं और उससे मिलने वाली राशि को उन शहीदों के वंशजों को दे देते हैं। अब तक वे कई पुस्तकों के माध्यम से क्रांतिकारियों के परिवारों की मदद कर चुके हैं।

शिवनाथ कहते हैं कि भारत में हज़ारों प्रकाशक हैं और लाखों-करोड़ों किताबों का प्रकाशन होता है, परन्तु शायद ही कोई किताब किसी के जीवन को बदल पायी हो। एक मनुष्य के नाते लोग इतना तो कर ही सकते हैं कि वे हमारे प्रयास का साथ दें, मदद करें अथवा नहीं।

आज की पीढ़ी अपने बच्चों को स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में, शहीदों के बारे में, उनके बलिदानों के बारे में या उनके त्याग के बारे में एक शब्द भी नहीं बताते हैं। लेकिन अपने बच्चों से ये उम्मीद जरूर रखते हैं कि उनकी संतान संस्कारी होने के साथ-साथ एक इंसान भी बने और वो राष्ट्र के प्रति समर्पित भी हो। यह सारी चीजें एक साथ संभव नहीं है है। हाथ में स्मार्ट फोन होने या स्मार्ट सिटी में रहने से आपकी मानसिकता स्मार्ट नहीं हो सकती और एक यही कारण है की आज के बच्चे मंगल पण्डे के रूप में आमिर खान को, भगत सिंह के रूप में अजय देवगन को जानते है।

2007 में शिवनाथ (Shivnath Jha) एक किताब के माध्यम से तात्या टोपे के वंशज विनायक राव टोपे की जिंदगी बदले। उस किताब के सहारे उन्होंने तत्कालीन रेल मंत्री के सहयोग से विनायक राव टोपे की दो बेटियों – प्रगति और तृप्ति – को कन्टेनर कार्पोरेशन ऑफ़ इण्डिया में नौकरी दिलवाये, साथ ही, लोकमत समाचार पत्र समूह के श्री विजय दर्डा पांच लाख रूपये भी हस्तगत कराये।

दो वर्ष बाद 2009 में भारत के सभी प्रधान मंत्रियों पर बने एक किताब -“प्राइमिनिस्टर्स ऑफ़ इण्डिया: भारत भाग्य विधाता” – से भारत के अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर के वंशज सुल्ताना बेगम को नया जीवन देने का प्रयास किया गया। ये कलकत्ता के एक स्लम में रहती थीं। दो लाख रुपये के अलावे बेगम के प्रयास से तत्कालीन रेल मंत्री उनकी एक नतनी को रेलवे में नौकरी भी मिली।

सन 2011 में शिवनाथ और उनकी पत्नी उस समय तक ढूंढे गए सभी 18 वंशजों को मिलकर एक किताब बनाया जो जलियाँवाला बाग़ के महान क्रांतिकारी उधम सिंह, जिन्होंने उस घटना के 20 साल बाद माईकल ओ’ डायर को मौत के घाट उतारे थे, की बहन वंशज जीत सिंह को नया जीवन दिया। उस किताब से तक़रीबन साढ़े बारह लाख रुपये एकत्रित किये गए जो जीत सिंह को मिला। जीत सिंह 120 रुपये देहारी पर कार्य करते थे और कर्ज के बोझ में दबे थे।

2013 में उसी किताब में कुछ आमूल परिवर्तन कर एक और किताब “फॉरगोटेन हीरोज एंड मार्टियर्स ऑफ इंडिया फ्रीडम मूवमेंट” का प्रकाशन किया जिसका उद्देश्य बिजेंद्र सिंह को मदद करना था। बिजेंद्र सिंह शहीद राम प्रसाद बिस्मिल के दादा के परिवार से हैं। इन्हे सरकार की ओर से पचास के दशक में कोई 70 बीघा जमीन का आवंटन भी हुआ था – सम्मानार्थ स्वरुप – परन्तु स्थानीय नेता, अधिकारी और दबंगो के कारण वह जमीन धीरे-धीरे इनके हाथों से निकलती गयी। उस किताब से और सुलभ स्वच्छता आंदोलन के संस्थापक, डॉ. बिंदेश्वर पाठक के सहयोग से बिजेंद्र सिंह की बेटी प्रियंका की शादी कराई गयी। डॉ पाठक बिजेंद्र सिंह को 200,000 रुपये का चेक सौंपे।

फिर चार साल पहले 2015 में उन शहीदों के वंशजों में से एक वंशज की विधवा को मदद करने हेतु एक अलग किताब बना – इण्डियाज एबेंडंड मदर्स : विडोज ऑफ़ बनारस एंड मथुरा।

शिवनाथ (Shivnath Jha) कहते हैं: “अब तक हमने 70 से अधिक वंशजों को ढूंढा है और आज़ादी के 75 वे साल में 75 जीवित, परन्तु समाज से उपेक्षित वंशजों को मिलाकर एक सचित्र कॉफी टेबुल किताब “ब्लडलाईन्स” बनाने का संकल्प है जिसमे क्रांतिकारियों, नायकों और शहीदों के सचित्र विवरण शामिल होंगे – जिन्हें फांसी दी गई थी, उन्हें मार दिया गया था या विभिन्न जेलों में मर गए थे।”

शिवनाथ कहते हैं कि जब देश को आज़ादी मिली थी, भारत की आबादी 20-22 करोड़ थी. आज 130 करोड़ से भी अधिक है। देश और समाज का दुर्भाग्य है कि इतनी बड़ी आबादी भी 100-200 क्रान्तिकारियों, शहीदों के वंशजों को भी प्रतिष्ठित, सम्मानित जीवन नहीं दे सकती हैं और इसके लिए भी सरकार की ओर ऊँगली उठाते हैं।

अगर ऐसे प्रयास को भारत के 130 करोड़ लोगों में से एक लाख लोग ही ही प्रतिमाह अपने सम्पूर्ण कार्यकाल से महज 15 मिनट या आधे घंटे की कमाई से मदद करते हैं; तो आज़ादी के एक भी क्रान्तिकारी या शहीदों का परिवार भूखा नहीं सोयेगा।

शिवनाथ (Shivnath Jha) कहते हैं हमारा प्रयास एक व्यापारी के नजर से करोड़ों-अरबों का है। कई लोगों ने इस प्रयास को हथियाने की कोशिश भी की क्योंकि मेरे पास धन की कमी है। शहीदों के वंशजों के घर पर दीप जलाने के लिए जब भी अपने प्रयास और किताबों की डमी कॉपी लेकर गया, सबने इसमें एक बिजनेस देखा और उन्हें केवल किताब से मतलब था न कि उसमे बसी भावनाओं की क़द्र। सभी कहते हैं हम छापेंगे और आपका नाम दे देंगे, इससे बहुत पैसे कमाए जा सकते है।” बहरहाल, शिवनाथ अभी तीन ऐसे किताबों का डमी बनाकर तैयार किये हैं जो अपने आप में अद्भुत है।

शिवनाथ कहते हैं: “खुदीराम बोस के गुरु शहीद सत्येन्द्रनाथ बोस के वंशज के लिए हमने बनारस पर कार्य किया। 500 पन्नों से अधिक का सचित्र कॉफी टेबुल किताब। इसकी विशेषता यह है कि इस किताब में स्वामी विवेकानन्द की अपनी बड़ी बहन दिवंगत सूर्यमणि देवी की तीसरी पीढ़ी के वंशज 990 शब्द लिखे हैं। एक यह भी उद्देश्य है की बनारस के रिवर साईड व्यू को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साईट में समावेश किया जाय। मुझे विस्वास है कि प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी इस दिशा में पहल अवश्य करेंगे। यह किताब उन्हें पेश किया जायेगा।

इसी तरह लखनऊ क्रांति के समय के कुछ शहीदों के वंशजों के लिए लखनऊ पर एक ऐतिहासिक किताब बनाये हैं। साथ ही, पटना सात शहीदों की मूर्ति में से एक के वंशज के लिए गया और बोध गया पर भी किताब का डमी बनाकर तैयार रखे हैं।अभी तो दर-दर भटक रहे हैं, लोगों से भीख मांग रहे हैं, मदद मांग रहे हैं; लेकिन अब तक हाथ आगे नहीं आये हैं।”

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